हनुमान जी के जन्म की पूरी कथा
माता अंजनी और पवन देव के आशीर्वाद से हनुमान जी का जन्म — जानिए पूरी अलौकिक कहानी।
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सीता माता की खोज से लेकर लंका दहन तक — पूरी कथा हिंदी में
रामायण के सभी पात्रों में हनुमान जी का स्थान सबसे विशेष है। वे केसरी और अंजना के पुत्र हैं, इसलिए उन्हें केसरीनंदन और अंजनीसुत कहा जाता है। पवन देव के आशीर्वाद से जन्मे होने के कारण वे पवनपुत्र और वायुपुत्र भी कहलाते हैं।
हनुमान जी भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार माने जाते हैं। उनमें अनंत शक्ति, असीम बुद्धि, और अपार भक्ति का अद्भुत संगम है। रामायण में वे केवल एक सेवक नहीं, बल्कि श्री राम की विजय के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
जब श्री राम और लक्ष्मण जी सीता माता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुँचे, तब सुग्रीव ने भयभीत होकर हनुमान जी को उनके पास टोह लेने भेजा। हनुमान जी ने एक ब्राह्मण का रूप धारण करके श्री राम से मुलाकात की।
श्री राम हनुमान जी की वाणी, बुद्धि और विनम्रता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लक्ष्मण जी से कहा — "इनके मुख से निकले हर शब्द में वेद का ज्ञान झलकता है।" हनुमान जी ने श्री राम को पहचान लिया और उनके चरणों में गिर पड़े।
संपाती से जानकारी मिली कि सीता माता लंका में हैं। समस्या यह थी कि सौ योजन का विशाल समुद्र पार करना था। सभी वानर इस कार्य में असमर्थ थे। तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी विस्मृत शक्ति याद दिलाई।
जामवंत के वचन सुनकर हनुमान जी का पूरा स्वरूप बदल गया — शरीर पर्वत जितना विशाल हो गया। महेंद्र पर्वत से उन्होंने ऐसी छलांग लगाई कि पर्वत काँप उठा और समुद्र की लहरें आकाश तक उठ गईं। मार्ग में मैनाक, सुरसा और सिंहिका जैसी बाधाओं को पार करते हुए वे लंका पहुँचे।
लंका पहुँचकर हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धारण किया और पूरी लंका का निरीक्षण किया। अशोक वाटिका में सीता माता एक वृक्ष के नीचे राक्षसियों से घिरी बैठी थीं और निरंतर श्री राम का नाम जप रही थीं।
हनुमान जी ने श्री राम की मुद्रिका (अंगूठी) सीता माता के सामने गिराई। श्री राम के सभी निजी संकेत बताने पर सीता माता को विश्वास हुआ और उन्होंने हनुमान जी को चूड़ामणि देकर श्री राम के लिए संदेश भेजा।
हनुमान जी ने जानबूझकर वाटिका नष्ट की ताकि रावण तक खबर पहुँचे। अक्षयकुमार सहित अनेक योद्धाओं को परास्त किया। इंद्रजीत ने ब्रह्मास्त्र से बाँधा — हनुमान जी स्वेच्छा से बंधे रहे।
हनुमान जी ने निर्भीकता से कहा — "मैं श्री राम का दूत हूँ। सीता माता को लौटा दो, वरना लंका का विनाश निश्चित है।" रावण ने क्रोध में पूँछ में आग लगवाई। हनुमान जी ने उस जलती पूँछ से पूरी सोने की लंका जला दी।
वापस लौटकर हनुमान जी ने श्री राम को सीता माता के जीवित और सुरक्षित होने की खबर दी। जब उन्होंने चूड़ामणि दी, तो श्री राम की आँखों में आँसू आ गए। श्री राम ने हनुमान जी को गले लगाते हुए कहा — "तुमने आज जो किया, उसके बदले मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं।"
राम-रावण युद्ध में हनुमान जी ने अनगिनत राक्षस योद्धाओं का वध किया। समुद्र पर पुल निर्माण में पर्वत उठाकर लाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। जब श्री राम और लक्ष्मण जी नागपाश में बँध गए, तब हनुमान जी गरुड़ जी को लेकर आए और नागपाश को नष्ट किया।
मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। सूरज उगने से पहले हिमालय से संजीवनी बूटी लानी थी। हनुमान जी बूटी पहचान नहीं पाए तो पूरा पर्वत ही उठा लाए। संजीवनी बूटी से लक्ष्मण जी को जीवनदान मिला।
पाताल के राजा अहिरावण ने माया से श्री राम और लक्ष्मण जी का अपहरण किया। हनुमान जी पाताल पहुँचे, वहाँ अपने पुत्र मकरध्वज को पाया, और अहिरावण के पाँचों दीपक एकसाथ बुझाकर उसका वध किया। इस प्रकार श्री राम और लक्ष्मण जी को मुक्त कराया।
रावण के वध के बाद हनुमान जी भरत जी को श्री राम के आगमन की शुभ सूचना देने अयोध्या गए। राज्याभिषेक में हनुमान जी ने केवल यह माँगा — "जब तक इस पृथ्वी पर श्री राम का नाम रहे, मैं जीवित रहूँ।" श्री राम ने तथास्तु कहा — इसीलिए हनुमान जी आज भी चिरंजीवी हैं।
सीता माता ने मोतियों का हार दिया। हनुमान जी ने उसे तोड़कर देखा — "इसमें राम नाम नहीं।" जब सीता माता ने पूछा कि क्या हृदय में राम हैं, हनुमान जी ने अपना सीना चीरकर दिखाया — उसमें श्री राम और सीता माता विराजमान थे!
रामायण में हनुमान जी केवल एक पात्र नहीं — वे भक्ति, शक्ति, बुद्धि और निःस्वार्थ सेवा के प्रतीक हैं। बिना हनुमान जी के रामायण की विजय संभव नहीं थी। आज भी जो कोई सच्चे मन से उनका स्मरण करता है, वे उसकी हर समस्या हर लेते हैं।
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रामचरितमानस का सुंदरकांड हनुमान जी की वीरता का सबसे सुंदर वर्णन है।
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