॥ श्री सुंदरकांड पाठ ॥

हनुमान जी की विजय का यह अध्याय आत्मविश्वास और सफलता प्रदान करने वाला है।

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॥ मंगलाचरण ॥

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं।
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्॥
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं।
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥
दोहा 1
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुखु कंद मूल फल खाई॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
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दोहा 60
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥

॥ इति सुंदरकांड समाप्त ॥

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

सुंदरकांड का पाठ कब करना चाहिए?

मंगलवार और शनिवार को पाठ करना विशेष फलदायी है। संकट के समय कभी भी इसका पाठ शुरू किया जा सकता है।

पाठ के क्या लाभ हैं?

यह मानसिक शक्ति, भय से मुक्ति और कार्य सिद्धि के लिए अचूक माना जाता है।