हनुमान जी के जन्म की पूरी कथा — माता अंजनी और पवन देव का वरदान
त्रेतायुग में माता अंजनी और पवन देव के आशीर्वाद से हनुमान जी का जन्म हुआ। जानिए इस अलौकिक जन्म की पूरी कहानी और बालहनुमान की लीलाएं।
जय बजरंग बली 🙏
आरती कीजै हनुमान लला की — भक्तिपूर्वक पाठ करें
आरती कीजै हनुमान लला की
"आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की" — इस पंक्ति से आरती का प्रारंभ होता है, जिसका सीधा अर्थ है कि हम हनुमान जी की आरती कर रहे हैं, जो दुष्टों का दलन (नाश) करने वाले और भगवान श्रीराम की दिव्य शक्ति (कला) के साकार रूप हैं। आरती का प्रत्येक पद हनुमान जी के किसी न किसी पराक्रम, सेवा-भाव या भक्ति-शक्ति का वर्णन करता है।
उदाहरण के लिए "जाके बल से गिरिवर काँपे" पंक्ति हनुमान जी के अपार बल का वर्णन करती है, जिनके बल मात्र से पहाड़ काँप उठते थे। वहीं "लंका जारि सिया सुधि लाई" पंक्ति माता सीता की खोज और लंका दहन की कथा का संक्षिप्त सार है। इसी प्रकार "आणि संजीवन प्राण उबारे" पंक्ति में लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लाकर उनके प्राण बचाने की प्रसिद्ध घटना का स्मरण कराया गया है।
आरती के अंतिम चरण में "सुर नर मुनि जन आरती उतारें, जय जय जय हनुमान उचारें" पंक्तियों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि देवता, मनुष्य और मुनि — सभी हनुमान जी की आरती करते हुए उनकी जय-जयकार करते हैं। इस प्रकार यह आरती केवल स्तुति नहीं, बल्कि हनुमान जी के संपूर्ण जीवन-चरित्र, उनकी वीरता और भक्ति-भाव का सार-संग्रह है।
सनातन परंपरा में किसी भी पूजा, पाठ या मंत्र-जाप के पश्चात आरती करना अनिवार्य माना गया है। आरती के माध्यम से भक्त अपने आराध्य देव के समक्ष पूर्ण समर्पण, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करता है। हनुमान जी की आरती का विशेष महत्व इस बात में है कि यह संकटमोचक, बलशाली और निष्काम भक्ति के प्रतीक देवता की स्तुति है।
मान्यता है कि जो भक्त नियमित रूप से श्रद्धापूर्वक हनुमान आरती करता है, उसके जीवन से भय, रोग, शत्रु-बाधा और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है। हनुमान जी को "संकटमोचन" कहा जाता है, अर्थात वे अपने भक्तों के संकटों का तुरंत नाश करते हैं। आरती करने से मन में सकारात्मकता, आत्मबल और निर्भयता का भाव जागृत होता है।
हनुमान चालीसा के पाठ के पश्चात इस आरती का गायन घर-घर में, मंदिरों में और मंगलवार के विशेष पूजन में किया जाता है। इसकी सरल भाषा, लयबद्ध रचना और भावपूर्ण शब्द इसे हर आयु वर्ग के भक्तों के लिए सुगम बनाते हैं। बच्चे, बूढ़े और युवा — सभी इसे सहजता से कंठस्थ कर पाते हैं, यही कारण है कि यह आरती पीढ़ी दर पीढ़ी भक्तों के बीच प्रचलित रही है।
हनुमान जी की आरती करने से पहले कुछ सरल नियमों और तैयारियों का ध्यान रखा जाना चाहिए, जिससे पूजा सम्पूर्ण और फलदायी बने। नीचे चरणबद्ध विधि दी गई है:
मंगलवार और शनिवार का दिन हनुमान जी की पूजा हेतु विशेष शुभ माना जाता है। यदि संभव हो तो इन दिनों मंदिर जाकर आरती में सम्मिलित होना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
आरती करते समय कुछ पारंपरिक नियमों का पालन करने से पूजा की पूर्णता और शुद्धता बनी रहती है:
नियमित रूप से श्रद्धा-सहित हनुमान आरती करने वाले भक्तों को अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होने की मान्यता है:
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आरती और पूजा का वास्तविक लाभ श्रद्धा, नियमितता और सच्चे मन से किए गए भक्ति-भाव में ही निहित है, केवल औपचारिकता निभाने से नहीं।
हनुमान जी की आरती प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद और संध्या समय दीपक जलाकर की जा सकती है। मंगलवार और शनिवार को आरती करना विशेष फलदायी माना जाता है।
नियमित आरती करने से भय, रोग और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है, मन को शांति मिलती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
आरती करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करना शुभ माना जाता है। मूर्ति या चित्र के सामने स्थिर होकर खड़े रहें।
हाँ, परंपरागत रूप से पहले हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है और उसके बाद आरती की जाती है। दोनों एक साथ करने से पूजा संपूर्ण मानी जाती है।
दीपक (घी या तेल का), कपूर, धूप, फूल और घंटी आरती के लिए आवश्यक मानी जाती है। संभव हो तो कंचन थार (तांबे/पीतल की थाली) का उपयोग करें।
हाँ, महिलाएं भी श्रद्धा-भाव से हनुमान आरती और पूजा कर सकती हैं। हनुमान जी ब्रह्मचारी रूप में पूजनीय हैं, परंतु भक्ति में कोई भेद नहीं माना जाता।
घंटी की ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है, नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है और मन को पूजा में एकाग्र करने में सहायक मानी जाती है।
सामान्यतः हनुमान आरती का पूर्ण पाठ 2 से 3 मिनट में पूरा हो जाता है, इसलिए इसे रोज़ाना सुबह-शाम करना सरल है।
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