मेघनाद और हनुमान जी का युद्ध
रावण के सबसे शक्तिशाली पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) और हनुमान जी के बीच ब्रह्मास्त्र की कथा — सुंदरकांड का रोमांचक प्रसंग।
जय बजरंग बली 🙏
लंका युद्ध में रावण के महाबली भाई कुंभकर्ण का जागरण, वानर सेना से भीषण संग्राम और हनुमान जी से महायुद्ध — युद्धकाण्ड की महाकथा हिंदी में
जब लंका युद्ध में रावण की सेना हारने लगी, तब रावण ने अपने छोटे भाई महाबली कुंभकर्ण को छह माह की निद्रा से जगाया। जागते ही कुंभकर्ण ने भूख से व्याकुल होकर हजारों वानर और राक्षसों को खा लिया। हनुमान जी, सुग्रीव, अंगद सहित अनेक वानर वीरों ने उससे युद्ध किया। अंत में श्री राम जी ने ब्रह्मास्त्र से उसका वध किया।
रामायण की कथा में रावण के परिवार में तीन अत्यंत प्रसिद्ध नाम हैं — रावण, कुंभकर्ण और विभीषण। जहाँ रावण शक्ति और अहंकार का प्रतीक था, और विभीषण धर्म और सत्य का, वहीं कुंभकर्ण अपार बल, भूख और दीर्घनिद्रा के लिए जाना जाता था।
कुंभकर्ण विश्रवा मुनि और कैकसी का पुत्र था। वह रावण का छोटा भाई था और आकार में अत्यंत विशाल — एक चलते-फिरते पर्वत के समान। उसे भगवान ब्रह्मा से वरदान लेते समय एक विचित्र भूल हुई। वह 'निर्देवत्वम्' अर्थात देवताओं पर विजय माँगना चाहता था, परंतु देवी सरस्वती ने उसकी वाणी को भ्रमित कर दिया और वह 'निद्रावती' बोल गया — जिसका अर्थ था लंबी नींद। इस प्रकार उसे छह माह की नींद और केवल एक दिन जागने का अभिशाप मिला।
परंतु जब वह जागता था, तब उसकी शक्ति असीम होती थी। संपूर्ण देव-लोक में उसका नाम सुनकर भय व्याप्त हो जाता था। युद्धकाण्ड में जब लंका का संग्राम अपने चरमोत्कर्ष पर था, तब रावण को अपने इसी भाई की आवश्यकता पड़ी।
लंका में राम जी की वानर सेना से भीषण युद्ध चल रहा था। खर, दूषण, त्रिशिरा जैसे योद्धा मारे जा चुके थे। अनेक सेनापति और राक्षस वीर वानर सेना के हाथों मारे जा चुके थे। रावण अत्यंत चिंतित और व्याकुल था।
रावण ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि कुंभकर्ण को उसकी निद्रा से जगाया जाए। परंतु यह कार्य इतना सरल नहीं था। हजारों राक्षस ढोल, नगाड़े, शंख और तुरही लेकर उसके कानों के पास जाकर जोर-जोर से बजाने लगे। हाथियों के झुंड उसके शरीर पर चढ़कर चलने लगे। परंतु कुंभकर्ण की नींद नहीं टूटी।
हजारों राक्षस सैनिकों ने सहस्रों ढोल, नगाड़े और शंख एक साथ बजाए। इस ध्वनि से पूरी लंका गूँज उठी, परंतु कुंभकर्ण की गहरी नींद पर कोई असर न हुआ।
बड़े-बड़े मतवाले हाथियों को कुंभकर्ण के शरीर पर चलाया गया। उनके भारी पदों की चोटें भी उसे जगाने में असफल रहीं। तब और अधिक उपाय किए गए।
अंत में ढेरों मांस और सुरा की सुगंध फैलाई गई — भोजन की खुशबू कुंभकर्ण की भूख को जगाने में सहायक हुई। इस उपाय से कुंभकर्ण की नींद खुलने लगी।
जब कुंभकर्ण ने आँखें खोलीं और अंगड़ाई ली, तब उसके श्वास से वायु का तूफान उठा, उसके शरीर की हलचल से धरती काँप गई। समुद्र में लहरें उठ गईं। सारी लंका में उत्साह छा गया — महाबली कुंभकर्ण जाग गया!
जागने के बाद कुंभकर्ण ने पेट भरकर भोजन किया और रावण के पास आया। रावण ने उसे सारी परिस्थिति बताई। तब कुंभकर्ण ने रावण से निडर होकर सत्य कहा — "भैया, जो हुआ वह अनुचित था। सीता माता को हरण करना और धर्म के प्रतीक श्री राम से शत्रुता मोल लेना — यह गलती थी। अभी भी समय है, सीता माता को लौटा दो और युद्ध रोको।" परंतु रावण ने यह सलाह ठुकरा दी। कुंभकर्ण ने तब कहा — "मैं अपने भाई का साथ दूँगा, चाहे अंजाम कुछ भी हो। मेरा कुल-धर्म यही है।"
जब कुंभकर्ण युद्धभूमि की ओर बढ़ा, तब उसका विशाल शरीर देखकर वानर सेना में हाहाकार मच गया। ऐसा लगा जैसे एक चलता-फिरता पर्वत उनकी ओर आ रहा हो। उसके कदमों की धमक से धरती हिल रही थी, उसके श्वास से वृक्ष झुक रहे थे और आँखों में लाल आग की लपटें थीं।
कुंभकर्ण को देखकर अनगिनत वानर भाग खड़े हुए। उसने आते ही बड़े-बड़े शिलाखंड उठाए और वानर सेना पर फेंके। उसने मुट्ठी भर-भर कर वानरों को उठाकर खाना शुरू कर दिया। हजारों वानर सैनिक उसके पदों तले कुचले गए। उसकी भूख मिटाने के लिए हजारों जीव अपर्याप्त थे।
जब नल, नील, गवय, गवाक्ष जैसे वानर वीरों ने देखा कि उनकी सेना बिखर रही है, तब उन्होंने एकत्र होकर कुंभकर्ण पर पर्वतों और वृक्षों से प्रहार करना आरंभ किया। परंतु कुंभकर्ण ने बड़ी सहजता से उन सबके प्रहार झेले और उल्टे उन्हें ही मार-मारकर भगाना आरंभ किया। वानर सेना की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।
कुंभकर्ण का शरीर एक पर्वत के समान था। उसकी एक भुजा से सैकड़ों वानर दूर जा गिरते थे।
जागने के बाद उसकी भूख प्रचंड थी — उसने हजारों वानरों को खा लिया और वानर सेना का बड़ा नुकसान किया।
वानर वीरों के सैकड़ों प्रहार उसे रोक नहीं पाए। उसकी चर्म इतनी कठोर थी कि पर्वत-शिलाएँ भी उसे घायल नहीं कर पाईं।
जब हनुमान जी ने देखा कि वानर सेना बिखर रही है और कुंभकर्ण का आतंक छाया हुआ है, तब वे स्वयं आगे बढ़े। उन्होंने वानर सेना को धैर्य बँधाया और कुंभकर्ण के सामने आ गए। दोनों ओर से अत्यंत शक्तिशाली योद्धा — एक ओर पवनपुत्र हनुमान, जिनके हृदय में राम-नाम की अग्नि जल रही थी, दूसरी ओर कुंभकर्ण, जिसके विशाल देह में सहस्रों हाथियों का बल था।
हनुमान जी ने एक विशाल पर्वत-शिखर उखाड़ा और पूरी शक्ति से कुंभकर्ण के सीने पर दे मारा। इस प्रहार से कुंभकर्ण थोड़ा डगमगाया और उसके मुख से रक्त आया। संपूर्ण वानर सेना में जयघोष हो उठा।
इसके बाद हनुमान जी ने विशाल वृक्ष उखाड़-उखाड़ कर कुंभकर्ण पर प्रहार किया। उनकी गति इतनी तीव्र थी कि कुंभकर्ण उन्हें पकड़ नहीं पाया। प्रत्येक प्रहार से कुंभकर्ण का शरीर लहूलुहान होने लगा।
कुंभकर्ण ने अपनी लोहे की विशाल गदा उठाई और हनुमान जी पर दे मारी। इस प्रहार से हनुमान जी क्षणभर के लिए आकाश में दूर जा गिरे। परंतु अगले ही पल वे फिर उठ खड़े हुए और दोगुने वेग से लौटे — यही हनुमान जी की अजेय भक्ति-शक्ति का प्रमाण था।
हनुमान जी ने अपनी मुट्ठी बनाई और कुंभकर्ण की छाती और मुख पर जोरदार मुक्के लगाए। इस प्रहार से कुंभकर्ण के दाँत टूटे, रक्त बहने लगा और वह पीछे हटने पर विवश हुआ। यह भिड़ंत देखकर देवता भी आश्चर्यचकित थे।
हनुमान जी और कुंभकर्ण के इस युद्ध में हनुमान जी ने जो सबसे महत्वपूर्ण काम किया वह था — वानर सेना का मनोबल बनाए रखना। जब हजारों वानर भाग रहे थे, तब हनुमान जी ने अकेले कुंभकर्ण के सामने खड़े होकर सिद्ध कर दिया कि इस विशाल राक्षस को भी रोका जा सकता है। उनके इस साहस ने वानर सेना को एकजुट किया और युद्ध का पासा पलट दिया।
हनुमान जी की वीरता से प्रेरित होकर वानर राज सुग्रीव और अन्य महारथी वानर भी कुंभकर्ण से भिड़ गए। यह युद्ध अब एकल नहीं रहा — संपूर्ण वानर शीर्षस्थ योद्धाओं ने मिलकर इस महारक्षस को घेरा।
वानरराज सुग्रीव ने एक विशाल पर्वत-शिखर उठाकर कुंभकर्ण के सिर पर दे मारा। इस प्रहार से कुंभकर्ण डगमगा गया। परंतु कुंभकर्ण ने तुरंत सुग्रीव को पकड़ लिया और अपनी बाँह के नीचे दबाकर चलने लगा। वानर सेना में हाहाकार मच गया।
सुग्रीव ने बंदी होते हुए भी हिम्मत नहीं खोई। उन्होंने कुंभकर्ण के कान, नाक और होंठों को जोर से काटा। कुंभकर्ण दर्द से चिल्लाया और उसकी पकड़ ढीली पड़ गई। सुग्रीव ने उस क्षण का फायदा उठाया और कुंभकर्ण की पकड़ से छूटकर आकाश में उड़ गए और फिर से वानर सेना के बीच आ गए।
अंगद ने कुंभकर्ण के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ मारा। नल और नील ने उसके पैरों के नीचे आकर उन्हें काटना शुरू किया। गवाक्ष ने उसके सिर पर पर्वत-प्रहार किया। इन सब वीरों ने मिलकर कुंभकर्ण को घायल किया, थकाया और उसका ध्यान भटकाए रखा — ताकि राम जी अपना निशाना साध सकें।
हनुमान जी, सुग्रीव, अंगद सहित अनेक वानर वीरों ने एकजुट होकर युद्ध किया — यह टीमवर्क की मिसाल है।
सुग्रीव ने बंदी होकर भी बुद्धि से मुक्ति पाई। शक्ति से बड़ी बुद्धि होती है।
हनुमान जी की वीरता ने भागती सेना को एकत्र किया — नेतृत्व में यही गुण सबसे बड़ा होता है।
अनेक वानर वीरों के प्रहारों से कुंभकर्ण घायल और थका हुआ था, परंतु अभी भी अत्यंत खतरनाक था। वह बड़े-बड़े पर्वत उखाड़कर वानर सेना पर फेंक रहा था। तब श्री राम जी ने स्वयं धनुष उठाया।
श्री राम जी ने पहले अपने तीखे बाणों से कुंभकर्ण के हाथों में थमे पर्वत और अस्त्र-शस्त्रों को काट दिया। कुंभकर्ण के हाथ खाली हो गए। राम जी के बाण की गति और लक्ष्य अद्वितीय था।
राम जी ने इंद्र के वज्र के समान धारदार बाण कुंभकर्ण के दाहिने बाहु पर चलाया। उस बाण की शक्ति से कुंभकर्ण का एक विशाल बाहु कट गया और भूमि पर गिर पड़ा। लंका में हाहाकार मच गया।
एक भुजा कटने के बाद भी कुंभकर्ण रुका नहीं। वह मुँह से और पैरों से प्रहार करने लगा। तब राम जी ने दूसरे बाहु पर भी उसी प्रकार का बाण चलाया और वह भी कट गया। अब वह भुजारहित होकर वानर सेना पर दाँतों और पैरों से आक्रमण कर रहा था।
अंत में राम जी ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया। यह दिव्य अस्त्र वायु के समान वेगशील था। इस बाण ने कुंभकर्ण का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। कुंभकर्ण का विशाल शरीर धरती पर गिरा — एक पर्वत के भूस्खलन की तरह। संपूर्ण युद्धभूमि में राम-जय का घोष गूँज उठा।
कुंभकर्ण के वध का समाचार सुनकर रावण अत्यंत शोकाकुल हो गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। कुंभकर्ण उसका प्रिय भाई था, उसका सबसे विश्वस्त रक्षक था। रावण ने विलाप करते हुए कहा — "कुंभकर्ण के जाने के बाद अब मेरी लंका की रक्षा कौन करेगा? इस अपार शक्ति का अंत हो गया।" लंका में मातम छा गया।
हनुमान जी और कुंभकर्ण का यह युद्ध एक पूर्णतः प्रामाणिक और शास्त्र-सम्मत प्रसंग है —
इस प्रकार हनुमान जी और कुंभकर्ण का युद्ध पूर्णतः शास्त्र-प्रमाणित कथा है जो वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड का अभिन्न और केंद्रीय भाग है।
कुंभकर्ण और हनुमान जी की यह कथा केवल युद्ध का वर्णन नहीं — इसमें जीवन के अनेक गहरे सत्य छुपे हैं —
कुंभकर्ण ने रावण को सत्य बताया कि सीता-हरण गलत था। इस साहस को हम सबको अपनाना चाहिए — प्रिय होने पर भी सत्य बोलना।
हनुमान जी ने कुंभकर्ण जैसे महाशक्तिशाली राक्षस से अकेले युद्ध किया। यह शक्ति राम-भक्ति की देन थी।
कुंभकर्ण के पास अपार बल था, परंतु उसका उपयोग अधर्म की रक्षा में हुआ। परिणाम — अंत निश्चित था।
इस कथा में हनुमान जी ने एक महान नेता की तरह वानर सेना का नेतृत्व किया। जब सेना भाग रही थी, तब वे आगे आए और अकेले शत्रु से भिड़े। उनके इस साहस ने हजारों वानरों को रुकने और लड़ने के लिए प्रेरित किया। एक सच्चा नेता वही होता है जो संकट में सबसे आगे हो। हनुमान जी ने यही किया। साथ ही यह कथा यह भी सिखाती है कि अकेले लड़ने से बड़ा, एकजुट होकर लड़ना होता है — सुग्रीव, अंगद, नल, नील सबने मिलकर कुंभकर्ण को घायल और थका दिया, जिससे राम जी के लिए उसका वध संभव हुआ।
कुंभकर्ण रावण का छोटा भाई और विश्रवा मुनि का पुत्र था। वह आकार में एक पर्वत के समान विशाल था। ब्रह्माजी से वरदान माँगते समय उसकी वाणी भ्रमित हो गई और वह 'निद्रावती' बोल गया, जिससे उसे छह माह की नींद और बाकी छह माह जागने का शाप मिला। जब वह जागता था, तब उसकी शक्ति असीम होती थी — हजारों हाथियों के समान।
ब्रह्मा के वरदान के अनुसार कुंभकर्ण छह महीने सोता और केवल एक दिन जागता था। जब लंका पर राम जी की सेना ने आक्रमण किया और रावण की सेना हारने लगी, तब रावण ने उसे उसकी निद्रा बीच में ही तोड़कर जगाने का आदेश दिया। हजारों राक्षस, हाथी, नगाड़े और शंख लेकर कठिन परिश्रम के बाद उसे जगाया गया।
कुंभकर्ण के युद्धभूमि में आने पर वानर सेना में भगदड़ मच गई। हनुमान जी ने आगे आकर सेना को संभाला और स्वयं कुंभकर्ण से युद्ध किया। उन्होंने पर्वत-शिखर से उसके सीने पर प्रहार किया, वृक्षों से मारा और मुष्टि-प्रहार किए। कुंभकर्ण की गदा के प्रहार से हनुमान जी दूर जा गिरे, परंतु तुरंत उठकर फिर से भिड़ गए। यह युद्ध अत्यंत भीषण और रोमांचक था।
हाँ, यह रामायण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग है। जागने के बाद कुंभकर्ण ने रावण से निडरता से कहा कि सीता-हरण गलत था और उन्हें श्री राम को लौटा देना चाहिए। परंतु अहंकारी रावण ने यह सलाह नहीं मानी। तब कुंभकर्ण ने भाई-धर्म का पालन करते हुए युद्ध में जाना स्वीकार किया — यह उसकी व्यक्तिगत धार्मिक विवशता थी, सहमति नहीं।
कुंभकर्ण का अंतिम वध श्री राम जी ने किया। हनुमान जी, सुग्रीव, अंगद और अनेक वानर वीरों ने मिलकर पहले उसे घायल और थकाया। फिर राम जी ने क्रमशः उसके दोनों बाहु काटे, और अंत में ब्रह्मास्त्र से उसका मस्तक काट दिया। कुंभकर्ण का विशाल शरीर पर्वत की तरह धरती पर गिरा।
कुंभकर्ण की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण अत्यंत शोकाकुल हो गया। वह रावण का सबसे विश्वस्त और शक्तिशाली भाई था। इस वध से रावण की सेना का मनोबल पूर्णतः टूट गया, लंका में मातम छा गया। इसके बाद रावण ने मेघनाद (इंद्रजीत) और अन्य पुत्रों को युद्ध में भेजा।
हनुमान जी और कुंभकर्ण के युद्ध की यह कथा रामायण के युद्धकाण्ड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी अध्याय है। कुंभकर्ण का चरित्र अनेक दृष्टियों से विचारणीय है — एक ओर वह अपार बल का स्वामी था, दूसरी ओर उसमें इतनी नैतिक साहस थी कि उसने अपने भाई रावण को भी सत्य बताया।
हनुमान जी ने इस युद्ध में यह सिद्ध किया कि सच्ची भक्ति-शक्ति किसी भी शारीरिक शक्ति से बड़ी होती है। जो पवनपुत्र एक ओर विनम्रता और भक्ति के प्रतीक हैं, वही दूसरी ओर लंका के सबसे शक्तिशाली महारथी से भी निर्भीकता से लड़ने वाले महावीर हैं।
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पाताल लोक में हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण कर पाँच दीपक बुझाए और अहिरावण का वध किया।
रामचरितमानस का सुंदरकांड हनुमान जी की वीरता का सबसे सुंदर वर्णन है।