मकरध्वज और हनुमान जी का युद्ध
पाताललोक में हनुमान जी और उनके पुत्र मकरध्वज के बीच हुए अद्भुत युद्ध की संपूर्ण कथा — जन्म रहस्य और अहिरावण वध।
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जब हनुमान जी ने साधु-वेश में छुपे राक्षस को पहचानकर किया उसका वध
रावण ने हनुमान जी को भ्रमित करने के लिए अपने षड्यंत्री दूत कालनेमि को साधु-वेश में हिमालय भेजा। हनुमान जी संजीवनी बूटी की खोज में आए तो कालनेमि ने उन्हें भटकाने का प्रयास किया — किंतु हनुमान जी ने उसका छल भेदकर एक ही प्रहार में उसका वध कर दिया।
कालनेमि रावण के दरबार का एक अत्यंत शक्तिशाली और चालाक राक्षस था। वह न केवल रण-कौशल में दक्ष था, अपितु माया-विद्या और छल-प्रपंच में भी उसे महारत हासिल थी। रावण उस पर अत्यधिक विश्वास करता था और कठिन-से-कठिन षड्यंत्रों में उसे ही नियुक्त करता था।
शास्त्रों के अनुसार कालनेमि का पूर्व जन्म से गहरा संबंध है। वह वैकुण्ठ-द्वारपाल जय-विजय में से एक था जो ऋषि-शाप से राक्षस-योनि में जन्मा। कुछ पुराणों में उसे कंस का मातुल (मामा) भी कहा गया है। भगवान विष्णु के हाथों पहले भी वध होने के बाद भी रावण-सेवा में यह राक्षस अपनी नियति से बँधा रहा।
माया-विद्या: कालनेमि किसी भी रूप को धारण कर सकता था। साधु, तपस्वी, ब्राह्मण — किसी भी वेश में ढल जाना उसकी विशेषता थी। यही उसे रावण के लिए सबसे उपयोगी बनाता था।
लंका-युद्ध में मेघनाद (इंद्रजीत) ने अपनी शक्ति-बाण से लक्ष्मण जी को मूर्छित कर दिया। श्रीराम जी शोक में डूब गए और वानर-सेना में खलबली मच गई। तब वैद्यराज सुषेण ने बताया कि हिमालय पर स्थित द्रोणागिरि पर्वत पर संजीवनी बूटी उगती है — वही एकमात्र उपाय है।
इंद्रजीत ने नागपाश-मुक्ति के पश्चात् पुनः युद्ध में उतरकर लक्ष्मण जी पर शक्ति-बाण चलाया। यह दिव्यास्त्र इतना प्रचंड था कि लक्ष्मण जी तत्काल मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
भगवान श्रीराम ने भाई लक्ष्मण को मूर्छित देखकर गहरा शोक व्यक्त किया। वैद्यराज सुषेण ने आश्वस्त किया और हिमालय पर स्थित द्रोणागिरि से चार दिव्य औषधियाँ लाने का निर्देश दिया।
श्रीराम की आज्ञा से हनुमान जी तीव्र वेग से हिमालय की ओर उड़ चले। रात्रि के प्रथम प्रहर में ही वे उत्तर दिशा में उड़ते जा रहे थे — किंतु लंका में रावण को यह समाचार मिल चुका था।
मृतसंजीवनी
मृत व्यक्ति को जीवित करने वाली बूटी
विशल्यकरणी
शरीर से बाण निकालने वाली बूटी
सन्धानकरणी
टूटी हड्डियाँ जोड़ने वाली बूटी
सावर्ण्यकरणी
त्वचा का रंग पुनः लाने वाली बूटी
जब रावण को ज्ञात हुआ कि हनुमान जी संजीवनी लाने हिमालय जा रहे हैं तो उसके पेट में दर्द उठा। वह जानता था — यदि संजीवनी मिल गई तो लक्ष्मण जी पुनः जीवित हो जाएँगे और राम-सेना अजेय हो जाएगी।
रावण ने कालनेमि से कहा — "हे कालनेमि! तुम तुरंत साधु-वेश में हिमालय पर जाओ। जब हनुमान संजीवनी ढूँढते हुए पहुँचे, तो उसे भटकाओ। एक ऐसे तालाब के पास ले जाओ जहाँ मायावी मगरमच्छ छुपा है — वह हनुमान को मार देगा। यदि तुम सफल हुए तो मैं तुम्हें आधा राज्य दे दूँगा।"
कालनेमि ने इनकार करने का साहस नहीं किया, यद्यपि वह भीतर से जानता था कि हनुमान जी जैसे महावीर को धोखा देना असंभव है। किंतु रावण के भय से वह तैयार हो गया और तत्काल हिमालय की ओर उड़ चला।
कालनेमि ने एक तपस्वी ऋषि का रूप धारण किया — जटा, कमंडलु, वल्कल वस्त्र — और हिमालय की एक शांत पहाड़ी पर ध्यान-मुद्रा में बैठ गया। जब हनुमान जी संजीवनी की खोज में पहुँचे, तो उन्होंने एक तपस्वी को देखा।
हनुमान जी ने साधु को प्रणाम किया और कहा — "हे महात्मन्! मैं श्रीराम का दास हनुमान हूँ। लक्ष्मण जी मूर्छित हैं, उनके प्राण संकट में हैं। मुझे यहाँ संजीवनी बूटी ढूँढनी है, आप मार्गदर्शन करें।" कालनेमि ने साधु-वेश में बड़े शांत स्वर में कहा — "वत्स! वह तालाब देखो — उसमें स्नान करने से तुम्हें सब ज्ञान हो जाएगा और संजीवनी का पथ दिख जाएगा।"
अप्सरा के मुख से सत्य जानते ही हनुमान जी की आँखें लाल हो गईं। श्रीराम-भक्ति की अग्नि उनके हृदय में प्रज्वलित हो उठी। वे तत्काल उस साधु-वेशधारी राक्षस के पास पहुँचे।
हनुमान जी ने क्रोध में कहा — "हे पापी! तुमने साधु का वेश धरकर मुझे भटकाने की कोशिश की — किंतु जान लो, श्रीराम के भक्त को कोई माया नहीं भटका सकती। तुम्हारे रावण का षड्यंत्र विफल हो गया।" कालनेमि घबरा गया और अपना असली राक्षसी रूप धारण करके भागने का प्रयास करने लगा।
कालनेमि के वध के पश्चात् हनुमान जी ने संजीवनी बूटी की खोज की। किंतु जब वे द्रोणागिरि पर्वत पर पहुँचे और बूटियों को देखा तो वे पहचान न सके — सभी औषधियाँ एक जैसी दिख रही थीं।
हिमालय की उस पर्वत श्रृंखला का नाम जहाँ चारों दिव्य औषधियाँ उगती थीं। आज इसे उत्तराखंड का एक पर्वत माना जाता है।
संजीवनी रात में दीप्तिमान दिखती थी, किंतु हनुमान जी सही बूटी पहचान नहीं पा रहे थे — समय कम था।
हनुमान जी ने क्षण-भर में निर्णय लिया — संपूर्ण द्रोणागिरि पर्वत को ही उखाड़ लिया और लंका की ओर उड़ चले।
वैद्य सुषेण ने संजीवनी को पहचाना और औषधि तैयार की — लक्ष्मण जी उठ खड़े हुए, सेना में उल्लास फैल गया।
कालनेमि-वध की यह कथा केवल एक युद्ध-वर्णन नहीं है — यह जीवन के अनेक गहरे सत्यों का आख्यान है।
हनुमान जी ने साधु-वेश को देखकर भी अपनी भक्ति और विवेक नहीं खोया। सत्य हमेशा प्रकट होता है।
श्रीराम की भक्ति हनुमान जी की सबसे बड़ी शक्ति थी। कोई माया उसे भटका नहीं सकती — यही इस कथा का मूल संदेश है।
कालनेमि ने साधु का वेश धारण किया — किंतु वेश से व्यक्ति की असलियत नहीं बदलती। कर्म और इरादा ही सत्य है।
हनुमान जी ने कालनेमि-वध के बाद एक पल भी नहीं गँवाया — तत्काल संजीवनी-यात्रा पूर्ण की। लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना ही सफलता है।
रावण का षड्यंत्र — जो हनुमान जी को रोकने के लिए बनाया गया था — उल्टा पड़ा। बुराई का कोई भी षड्यंत्र सत्य को नहीं रोक सकता।
एक रात में कालनेमि-वध, ग्राह-वध, संजीवनी-यात्रा और पर्वत-उठान — हनुमान जी का संकल्प अटूट था।
कालनेमि एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस था जो रावण का मंत्री और विश्वासपात्र था। वह माया-विद्या और छल-कपट में अत्यंत कुशल था। रामायण के अनुसार कालनेमि पूर्व जन्म में वैकुण्ठ-द्वारपाल जय-विजय की परंपरा से जुड़ा था और भगवान विष्णु के हाथों पहले भी मारा जा चुका था। इस जन्म में भी उसका वध विष्णु-भक्त हनुमान जी के हाथों हुआ।
लक्ष्मण जी के शक्ति-बाण से मूर्छित होने के पश्चात् हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने हिमालय की ओर गए। रावण को भय था कि यदि संजीवनी मिल गई तो लक्ष्मण जी जीवित हो जाएँगे और राम-सेना और प्रबल हो जाएगी। इसलिए रावण ने हनुमान जी को भटकाने और मार्ग में विलम्ब करवाने के लिए कालनेमि को साधु-वेश में भेजा।
कालनेमि ने एक तपस्वी साधु का वेश धारण किया — जटा, कमंडलु, वल्कल वस्त्र — और हिमालय पर बैठ गया। जब हनुमान जी संजीवनी ढूँढते हुए पहुँचे तो कालनेमि ने उन्हें एक झील की ओर भेजा जहाँ एक मायावी मगरमच्छ छुपा था। उस मगरमच्छ ने हनुमान जी का पैर पकड़ा, किंतु हनुमान जी ने उसे परास्त करके मार डाला।
जलाशय में मायावी मगरमच्छ के वध के पश्चात् एक अप्सरा प्रकट हुई और उसने बताया कि वह झूठा साधु असल में राक्षस कालनेमि है। यह सुनते ही हनुमान जी ने अपने बाएँ हाथ से कालनेमि को ऐसा प्रहार किया कि वह उड़ता हुआ लंका में जा गिरा और प्राण-त्याग कर दिया। वाल्मीकि रामायण में इस एकल मुष्टि-प्रहार का वर्णन है।
कालनेमि वध के पश्चात् हनुमान जी ने संजीवनी बूटी की खोज की। जब सही बूटी न पहचान सके तो उन्होंने पूरे द्रोणागिरि पर्वत को ही उखाड़ लिया और तेज गति से लंका लौटे। वैद्य सुषेण ने संजीवनी से लक्ष्मण जी का उपचार किया और वे स्वस्थ हो गए। पूरी वानर-सेना में आनंद छा गया।
कालनेमि की कथा वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड (सर्ग ७४) में विस्तार से वर्णित है। इसके अतिरिक्त रामचरितमानस के लंकाकाण्ड में तुलसीदास जी ने भी इस प्रसंग का काव्यात्मक वर्णन किया है। आनंद रामायण और स्कंद पुराण में भी कालनेमि का उल्लेख मिलता है।
कालनेमि-वध की यह कथा हमें याद दिलाती है कि माया, छल और षड्यंत्र कभी सत्य-भक्ति को नहीं जीत सकते। कालनेमि ने साधु का वेश धारण करके हनुमान जी को भटकाने की कोशिश की, किंतु हनुमान जी का विवेक और श्रीराम के प्रति अटूट समर्पण किसी भी माया से परे था।
एक रात में ही — कालनेमि-वध, ग्राह-वध, अप्सरा-मोक्ष, संजीवनी-यात्रा और द्रोणागिरि-उत्थान — हनुमान जी ने सब कर दिखाया। यही उनकी महिमा है — प्रभु-कार्य सिद्धि में कोई विघ्न नहीं।
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