राक्षसी लंकिनी का वध — लंका-प्रवेश कथा
लंका के द्वार पर रक्षिका लंकिनी ने हनुमान जी को रोका — कैसे एक ही मुष्टि-प्रहार से ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी सत्य हुई।
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पाताललोक में पिता-पुत्र के बीच हुई अद्भुत युद्ध कथा
जब अहिरावण ने श्रीराम-लक्ष्मण का हरण किया, तब हनुमान जी पाताललोक पहुँचे। वहाँ उनका सामना मकरध्वज से हुआ — जो उनका ही पुत्र था। दोनों में घोर युद्ध हुआ, हनुमान जी ने मकरध्वज को परास्त किया, अहिरावण का वध किया और श्रीराम-लक्ष्मण को मुक्त कराया।
लंका-युद्ध अपने चरमोत्कर्ष पर था। श्रीराम की सेना वीरता से लड़ रही थी और रावण की शक्ति क्षीण होती जा रही थी। ऐसे में रावण ने अपने एक अत्यंत शक्तिशाली मित्र और पाताललोक के राक्षस-राज अहिरावण (महिरावण) को सहायता के लिए बुलाया।
अहिरावण माया-विद्या में अत्यंत पारंगत था। वह भगवती शक्ति का उपासक था और उसने देवी के सामने बलि चढ़ाने की प्रतिज्ञा ली हुई थी। रावण के आग्रह पर उसने एक षड्यंत्र रचा — रात्रि के अंधेरे में, सोते हुए श्रीराम और लक्ष्मण जी को उठाकर पाताललोक ले जाना और वहाँ उन्हें देवी को बलि चढ़ाना।
भोर से पहले जब वानर-सेना जागी, तो श्रीराम और लक्ष्मण जी अनुपस्थित पाए गए। सारी सेना में हाहाकार मच गई। विभीषण जी के बताए पर निश्चित हुआ कि उन्हें अहिरावण पाताललोक ले गया है। तब पवनपुत्र हनुमान जी ने बिना विलंब के पाताललोक की ओर प्रस्थान किया।
पाताललोक के द्वार पर हनुमान जी का सामना एक असाधारण योद्धा से हुआ — मकरध्वज। मकरध्वज का शरीर देखते ही हनुमान जी चकित रह गए, क्योंकि उसका मुख और तेज हनुमान जी से ही मिलते-जुलते थे।
लंका-दहन के पश्चात् जब हनुमान जी ने अपनी जलती हुई पूँछ को समुद्र में बुझाया, उस समय उनके तेज और श्रम से उत्पन्न स्वेद (पसीने) की एक बूँद समुद्र की जल-धारा में मिल गई।
उस बूँद को समुद्र में निवास करने वाली एक विशालकाय मकरी (मगरमच्छ) ने निगल लिया। हनुमान जी का तेज अत्यंत दिव्य था, अतः उस बूँद से उस मकरी के गर्भ में एक वीर पुत्र का जन्म हुआ — जिसका नाम पड़ा मकरध्वज (मकर = मगरमच्छ, ध्वज = जिसकी ध्वजा)।
इस प्रकार हनुमान जी आजन्म ब्रह्मचारी रहते हुए भी, उनके दिव्य तेज से एक पुत्र संसार में आया। यह कथा हनुमान जी के असाधारण दिव्य स्वरूप की परिचायक है।
मकरध्वज अहिरावण का विश्वासपात्र सेनापति और पाताललोक के प्रमुख द्वार का रक्षक था — उसकी शक्ति असाधारण थी।
मकरध्वज को पिता हनुमान जी का अंश-बल प्राप्त था — वह इतना शक्तिशाली था कि देवता भी उसके साथ युद्ध में झिझकते।
मकरध्वज अपने स्वामी के प्रति निष्ठावान था — उसने कर्तव्य के रूप में अपने पिता का मार्ग भी रोका, यही उसकी महानता थी।
पाताललोक का मार्ग अत्यंत दुर्गम और रहस्यमय था। हनुमान जी ने विभीषण जी से पाताललोक का मार्ग जाना और अपनी असीम शक्ति के बल पर उस अंधकारमय राज्य में प्रवेश किया।
विभीषण जी ने हनुमान जी को बताया कि पाताललोक में पाँच प्रवेश-द्वार हैं और प्रत्येक द्वार पर शक्तिशाली रक्षक नियुक्त हैं। अहिरावण की मृत्यु का रहस्य भी विभीषण ने बताया — पाँच दीपकों में छिपे प्राण।
हनुमान जी ने श्रीराम का स्मरण करते हुए पाताललोक की सुरंग में प्रवेश किया। मार्ग में अनेक द्वार-रक्षकों को परास्त करते हुए वे आगे बढ़ते रहे। चारों ओर घना अंधकार था और विचित्र राक्षसों की गर्जना सुनाई पड़ती थी।
अनेक द्वार पार करने के पश्चात् हनुमान जी पाताललोक के मुख्य द्वार पर पहुँचे — और यहाँ उनका सामना हुआ एक ऐसे योद्धा से जिसे देखकर स्वयं हनुमान जी क्षण-भर को रुक गए।
पाताललोक को अनेक ग्रंथों में भूमि के नीचे स्थित एक अत्यंत समृद्ध और भव्य राज्य के रूप में वर्णित किया गया है। यहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता, किंतु दिव्य मणियों और रत्नों की आभा से सारा राज्य प्रकाशित रहता है। अहिरावण इसी राज्य का अधिपति था — एक महाशक्तिशाली राक्षस जो माया-विद्या में अद्वितीय था।
मुख्य द्वार पर पहरा दे रहे मकरध्वज ने हनुमान जी को देखकर मार्ग रोका। दोनों ने एक-दूसरे को ललकारा और घोर युद्ध आरंभ हुआ।
मकरध्वज को बाँधने के पश्चात् हनुमान जी ने उससे पूछा कि तुम्हारे पिता कौन हैं — और जब मकरध्वज ने उत्तर दिया, तब दोनों को एक-दूसरे का परिचय हुआ। यह क्षण अत्यंत भावपूर्ण था।
मकरध्वज ने विनम्रतापूर्वक कहा — "मेरे पिता स्वयं पवनपुत्र हनुमान जी हैं — लंका-दहन के समय समुद्र में उनके तेज से मेरी माता मकरी के गर्भ से मेरा जन्म हुआ। मैं उनकी सन्तान हूँ, यद्यपि मैंने उन्हें कभी देखा नहीं।" — यह सुनते ही हनुमान जी का हृदय भर आया। उन्होंने मकरध्वज को बताया कि वे ही उसके पिता हैं।
पिता-पुत्र का पहला मिलन युद्ध के पश्चात् हुआ — मकरध्वज ने तत्काल हनुमान जी के चरणों में मस्तक झुकाया और क्षमा माँगी कि उसने अपने पिता से ही युद्ध किया।
हनुमान जी ने पुत्र को आशीर्वाद दिया और कहा — "तुमने अपने स्वामी के प्रति कर्तव्य का पालन किया, यह तुम्हारी महानता है। अब मेरा कार्य पूर्ण होने दो, तत्पश्चात् तुम्हें उचित सम्मान मिलेगा।"
इस प्रसंग में मकरध्वज की कर्तव्य-निष्ठा और हनुमान जी की उदारता दोनों की महानता प्रकट होती है। मकरध्वज को अपने स्वामी से भी बढ़कर धर्म मिला — अपने पिता हनुमान जी की शरण।
मकरध्वज को द्वार पर बाँधकर हनुमान जी अहिरावण के महल में घुसे। वहाँ उन्होंने देखा कि श्रीराम और लक्ष्मण जी को बंदी बनाकर देवी के सामने बलिदान की तैयारी हो रही है।
पूर्व दिशा
प्रथम दीपक
पश्चिम दिशा
द्वितीय दीपक
उत्तर दिशा
तृतीय दीपक
दक्षिण दिशा
चतुर्थ दीपक
मध्य (ऊर्ध्व)
पंचम दीपक
मकरध्वज हनुमान जी के पुत्र थे। लंका-दहन के समय जब हनुमान जी ने अपनी जलती हुई पूँछ को समुद्र में बुझाया, तब उनके स्वेद की एक बूँद समुद्र में गिरी। उस बूँद को एक मकरी (मगरमच्छ) ने निगल लिया और उसी से मकरध्वज का जन्म हुआ। इस प्रकार हनुमान जी ब्रह्मचारी रहते हुए भी उनके दिव्य तेज से एक पुत्र संसार में आया।
अहिरावण ने छल से सोते हुए श्रीराम और लक्ष्मण जी को पाताललोक में ले जाकर बलि चढ़ाने का षड्यंत्र रचा था। हनुमान जी उन्हें बचाने पाताललोक पहुँचे, जहाँ मकरध्वज पाताललोक का द्वार-रक्षक था। अपने कर्तव्य के अनुसार मकरध्वज ने हनुमान जी का मार्ग रोका, जिससे पिता-पुत्र में युद्ध हुआ।
मकरध्वज अत्यंत बलशाली था और उसने हनुमान जी को घोर युद्ध में चुनौती दी। दोनों में भीषण युद्ध हुआ किंतु अंत में हनुमान जी ने अपनी दिव्य पूँछ से मकरध्वज को बाँध लिया और उसे वश में कर लिया। जब हनुमान जी ने बताया कि वे उसके पिता हैं, तो मकरध्वज ने विनम्रतापूर्वक उनके चरण स्पर्श किए।
अहिरावण की मृत्यु का रहस्य उसके प्राण थे जो पाँच दीपकों में अलग-अलग दिशाओं में जल रहे थे। हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया — हनुमान, नरसिंह, गरुड़, वाराह और हयग्रीव — और एक साथ पाँचों दीपक बुझाए। इस प्रकार अहिरावण का वध हुआ और भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जी मुक्त हुए।
यह कथा मुख्यतः आनंद रामायण, महाभारत के उत्तर-खंड, स्कंद पुराण एवं कई उत्तर-भारतीय रामायण परंपराओं में वर्णित है। वाल्मीकि रामायण की मूल संहिता में अहिरावण-मकरध्वज प्रसंग प्रक्षिप्त माना जाता है, किंतु यह कथा लोक-परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध और रामलीला का आवश्यक अंग है।
अहिरावण-वध के पश्चात् हनुमान जी ने मकरध्वज को पाताललोक का राजा नियुक्त किया और धर्मपूर्वक राज्य करने का आदेश दिया। मकरध्वज ने पिता हनुमान जी के चरणों में नमन किया और पाताललोक का शासन सँभाला। यह प्रसंग पिता-पुत्र के अद्वितीय संयोग और धर्म-निष्ठा की अमर कथा है।
मकरध्वज और हनुमान जी की यह कथा हमें अनेक जीवन-मूल्य सिखाती है — पुत्र ने बिना यह जाने कि सामने उसके पिता हैं, अपने स्वामी के प्रति कर्तव्य निभाया; और पिता ने पुत्र से युद्ध करते हुए भी लक्ष्य से भटके नहीं।
यह कथा हमें बताती है कि कर्तव्य और धर्म सर्वोपरि हैं — यहाँ तक कि पिता-पुत्र के बंधन से भी बड़े। और जब श्रीराम-भक्त हनुमान जी कार्य पर निकलते हैं, तो न पाताल की माया उन्हें रोक सकती है, न पुत्र का प्रेम — बस एक ही लक्ष्य रहता है: प्रभु-कार्य सिद्धि।
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